New Guidelines For EVM Bihar Elections: बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं. भले ही चुनाव आयोग ने अभी तक मतदान की तारीखों का ऐलान नहीं किया है, लेकिन उससे पहले एक अहम बदलाव लागू कर दिया गया है. इस बार मतदाता जब वोट डालने पहुंचेंगे तो उन्हें ईवीएम बैलेट पर उम्मीदवारों की रंगीन तस्वीरें दिखाई देंगी. इससे पहले तक बैलेट पेपर पर फोटो ब्लैक एंड व्हाइट ही छपते थे.
चुनाव आयोग का कहना है कि यह पहल सबसे पहले बिहार से शुरू की जा रही है. बाद में इसे अन्य राज्यों में भी लागू किया जाएगा. नई गाइडलाइन के तहत उम्मीदवार की तस्वीर बैलेट पेपर पर तीन-चौथाई हिस्से में होगी ताकि मतदाता चेहरे को आसानी से पहचान सकें. साथ ही क्रम संख्या को भी पहले से ज्यादा प्रमुखता दी जाएगी. चलिए जानें कि चुनाव आयोग एक बूथ पर EVM लगाने पर कितना खर्च करता है.
ईवीएम बनाने का खर्चा
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बैलट यूनिट की कीमत करीब 7991 रुपये है, जबकि कंट्रोल यूनिट की कीमत 9812 रुपये तय की गई है. इन दोनों से भी महंगा हिस्सा है वीवीपैट, जिसकी कीमत लगभग 16,132 रुपये है. एक बार खरीदी गई ईवीएम मशीन औसतन 15 साल तक इस्तेमाल की जा सकती है, जिससे चुनाव की लागत घटने का तर्क दिया जाता है. हालांकि, आलोचकों का मानना है कि चुनाव समाप्त होने के बाद ईवीएम को सुरक्षित रखने और उन पर हाईटेक निगरानी करने में काफी ज्यादा खर्च होता है.
पोलिंग बूथ पर ईवीएम के लिए कितना होता है खर्चा
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव कराना आसान काम नहीं है. हर बूथ पर पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है. रिपोर्ट्स की मानें तो केवल एक मतदान केंद्र पर EVM लगाने और उससे जुड़े इंतजामों पर औसतन 50 से 60 हजार रुपये तक का खर्च आता है. इसमें ईवीएम की तकनीकी व्यवस्था, परिवहन, सुरक्षा बलों की तैनाती और मतदान कर्मियों के भत्ते तक सब शामिल होता है.
विधानसभा से लोकसभा तक का खर्चा
अगर विधानसभा चुनाव की बात करें तो एक राज्य में लाखों बूथ बनाए जाते हैं. ऐसे में कुल खर्चा हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. वहीं, लोकसभा चुनाव का दायरा इससे कहीं बड़ा होता है. पूरे देश में लगभग 10 लाख से ज्यादा पोलिंग बूथ स्थापित किए जाते हैं. इस हिसाब से केवल बूथ और ईवीएम प्रबंधन पर ही हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है.
चुनाव आयोग का कहना है कि यह खर्च लोकतंत्र की मजबूती और निष्पक्ष चुनाव की गारंटी के लिए किया जाता है. खर्च में सुरक्षा इंतजाम, कर्मियों का प्रशिक्षण, पोलिंग स्टेशनों पर सुविधाएं और मतदाता जागरूकता अभियान भी शामिल हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक और पारदर्शिता के लिए यह निवेश जरूरी है.
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