शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला आर्मी ऑफिसर्स ने गुरुवार (18 सितंबर, 2025) को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि स्थाई कमीशन देने में उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. उनका कहना है कि वह गलवान, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसे महत्वूर्ण अभियानों का हिस्सा रही हैं, फिर भी स्थाई कमीशन के समय उन्हें पुरुष अधिकारियों की तुलना में भेदभाव का सामना करना पड़ा है.
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच मामले पर सुनवाई कर रही थी. बेंच को सेवारत और सेवामुक्त महिला अधिकारियों ने बताया कि सरकार ने 2020 और 2021 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी निर्देशों का बार-बार उल्लंघन किया है.
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार कुछ अधिकारियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट वी मोहना कोर्ट में पेश हुईं. उन्होंने बेंच से कहा, ‘सरकार ने 2020 और 2021 में जारी किए गए परमादेश का बार-बार उल्लंघन किया है और महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन देने में भेदभाव किया है.’
एडवोकेट वी मोहना ने बताया कि सरकार ने स्थाई कमीशन में महिला अधिकारियों की कम संख्या के लिए खाली पदों की संख्या को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन 2021 के बाद से ऐसे कई मौके आए हैं जब 250 अधिकारियों की सीमा का उल्लंघन किया गया. वकील ने कहा, ‘ये अधिकारी बहुत प्रतिभाशाली हैं और उन्होंने गलवान, बालाकोट और हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में भी अपने कर्तव्यों का अच्छा प्रदर्शन किया है. इसके अलावा उन्होंने कई प्रतिकूल क्षेत्रों में अपने पुरुष अधिकारियों के बराबर सेवाएं दी हैं.’
स्थाई कमीशन से इनकार को चुनौती देने वाली अन्य महिला अधिकारियों का पक्ष रखने के लिए सीनियर एडवोकेट विभा दत्ता मखीजा, सीनियर एडवोकेट अभिनव मुखर्जी, सीनियर एडवोकेट रेखा पल्ली और अन्य वकील सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए. महिला अधिकारियों की ओर से दलीलें पूरी हो गई हैं. अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 24 सितंबर को करेगा. अगली सुनवाई में केंद्र अपनी दलीलें पेश करेगा, केंद्र का पक्ष रखने के लिए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी कोर्ट में पेश होंगे.
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मनमाना रवैया अपनाए जाने पर नाराजगी जताई थी कि किस तरह परमानेंट कमीशन में शॉर्ट सर्विस कमीशन की महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है. कोर्ट ने कहा था कि जब महिला अधिकारियों ने भी वही ट्रेनिंग ली है, जो पुरुष अधिकारियों को मिली और उनकी पोस्टिंग भी उसी तरह की जा रही हैं, तो इस मामले में दोनों को अलग तरीके से क्यों आंका जा रहा है.
कोर्ट ने सवाल किया था, ‘लिंग के आधार पर दो मानदंड कैसे हो सकते हैं. क्या शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए भी दोनों के लिए अलग-अलग मानदंड हैं या एसएससी और पर्मानेंट कमीशन के लिए अलग-अलग फॉर्मेट तय किए गए हैं?’
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