सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 अगस्त, 2025) को बहू के साथ क्रूरता करने के आरोप में फंसी महिला को बरी करते हुए टिप्पणी की है कि ससुराल वालों की ओर से दहेज के लिए बहू को प्रताड़ित किए जाने की बात हवा से भी तेजी से फैलती है. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया.
हाई कोर्ट ने महिला की दोषसिद्धि और तीन साल की सजा को बरकरार रखा था. महिला को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत इस आधार पर दोषी ठहराया गया था कि उनकी बहू ने मरने से पहले मायके के सदस्यों को बताया था कि ससुराल के सदस्य उसका दहेज के लिए उत्पीड़न कर रहे थे.
बहू से कभी दहेज की मांग नहीं
भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए, विवाहित महिला के प्रति उसके पति या उसके रिश्तेदारों की ओर से की गई क्रूरता के अपराध से संबंधित है. सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि अपीलकर्ता की पड़ोसी जो मामले में बतौर गवाह पेश हुई, ने दावा किया कि बहू से कभी दहेज की मांग नहीं की गई थी.
पीठ ने कहा, ‘उसके साक्ष्य को निचली अदालत और हाई कोर्ट की ओर से इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह दहेज की मांग के संबंध में कोई तथ्य पेश नहीं कर सकी, क्योंकि यह चारदीवारी के भीतर होता है, जो एक गलत निष्कर्ष है. विशेष रूप से ऐसे मामलों में जब सास-ससुर की ओर से दहेज के लिए बहू को परेशान किए जाने की बात हवा से भी तेजी से फैलती है.’
मृतक महिला पिता ने लगाया था आरोप
मृतका के पिता ने जून 2001 में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी ससुराल में मृत पाई गई थी. पिता ने आरोप लगाया था कि मौत के समय उनकी बेटी गर्भवती थी और उसने मायके के लोगों को बताया था कि उसकी सास दहेज के लिए ताने मारती है.
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